आत्मसमर्पण




कभी रोशनी तुम्हारे घर आती होगी,

मेरे घर आती है मगर अँधेरे से डरती है,
कभी खुशियों की बौछार से तुम्हारा घर खिल उठता होगा,
मेरे घर तो ख़ुशी कंबख़्त दुख के साथ आती है। 

खुशनसीब होते है वह लम्हे जब तुम साथ होते हो,
क्या घर,क्या रोशनी,क्या ख़ुशी,
सब कुछ तुम खुदमें समाए बैठे हो,
तुम्हे छूती हुँ तो लगता है ऐसे,
के जैसे तुम्हे कई बार गले लगा चुकी हुँ,
ज़िस्म तो सिर्फ कहने के लिए है,
आत्मसमर्पण तो कब का कर चुकी हुँ। 

----यशश्री (मनस्विनी)

Ab toh jee le zara


Unchaahi raahon par the hum chale
sapno ko karke raakh the hum jale

Bandh pinjre mein ghut 
rahe the jaise
Panchi udne ko hai tarse

Chaaya tha kuch aisa andhera
Intezaar tha ki kab hoga savera

Pukar rahi thi
Manzil ki woh raahein
Samajhne lagi thi un
Ishaaron ko meri nigaahein

Aankhon ko meechkar 
Mehsus karke hai jaana
Hume toh bas
Apni manzil ko hai paana

Kar rahe the woh
Jo kaha tumne
Seh rahe the zulm

Jo diye tumne
Par ab yeh dil hai ro raha...
Kehta hai... Ab Toh Jee Le Zara...
 

आंसूओंकी दो बूँदे


रोज़ाना रोनेकी जैसी आदत सी हो गयी है हमें,
ना ना हमें नहीं यह नादान आँखें नही मानती,
मन को तो हम समझाते है पर आँखें उतनीही चंचल|

हररोज़ रात तकिया गिला कर देती है,

आंसूओंकी दो बूँदे आँखों से फिसलकर गालों पर से गुजरते हुए,
कानो के निचे से गर्दन के पिछले हिस्से से होकर तकिये पर जा गिरती है, बची हुई आंसूओंकी लकीरे ऐसेही सूख जाती है|

लगता है हमारी आंसूओंको तकिये से प्यार हो गया है,

आंसू प्यार करके उसे छुपाना भी अच्छी तरह से जनते है,
उसे डर है कही तकिया गिला रहने की  वजह से मुझसे कोई सवाल न करे,

फिर दिन होता है, फिर रात आती है, 

फिर आँखें बूँदें बरसाती है,फिर तकिया गिला कर देती है|

------यशश्री (मनस्विनी)

Aye Waqt!


Kya tera jee nahin chaahta kabhi rukkne ka kahin?
Kya tu iss musalsal naukri se thakta nahin?
Kabse chalta ja raha hai...

Zara thheher ja, pagal!

Main baithhi hoon ek dost ke saath.
Tu bhi baithh ja yahin.

Teri saans phool rahi hai,
Aankhein jhool rahi hain,
Lag raha hai badla sa,
Kitna dubla patla sa...
Aisa kaisa bikhra hai haal?
Zara apni sehat sambhaal!
Yeh le chai, ab tu farmaa aaram.
Logon se kar thodi duaa-salaam.

Kya kaha?
Duty kaun karega?
Tere badle kaun chalega?

Main chalti hoon naa!
Iss dost ke saath.
Haathon mein haath.
Yun hi chalte rahenge hum...
Tu rukk ja, waqt, yahin tham ja!
Humein yun hi chalne de, samjha?

सोज़

















 ख़ुशी की बूंदो से भरा पत्ता
गम की टहनी से नाम क्यों हो जाता हैं?

स्पर्श के हाथों से भरी आदत
तन्हाई की महक से भूल क्यों जाती हैं?

अपनों के शब्द से भरा खत
अनजान सियाह से मिट क्यों जाता हैं?

प्यार की लहर से भरा प्याला
समुद्र के किनारे पहुंच चला क्यों जाता हैं?

दिल की नादानी से भरा रिश्ता
वक़्त के दायरे से रिहा क्यों हो जाता हैं?

विश्वास की पुकार से भरी आवाज़
शक के झोकों से दब क्यों जाती हैं?

साज़ की कशिश से भरी ज़िन्दगी
सोज़ की कसक से मात क्यों जाती हैं?

आँखोंवाला अँधापन



सोते सोते मेरी आँख लग गयी
आँख लगते लगते फिर नींद खुल गयी|
वैसे तो हम नींद टालने के सौ बहाने ढूँढ़ते रहते है,
डर लगता है हमें ख्वाबों से और यही चुभते रहते है,
इसलिए हम आँख भी नहीं लगने देते  |

पर यह कमबख्त मेरी सुनती कहा है?

चार चाय के प्याले पीनेपर भी खुली रहती ही नही,
इससे मुझे एक बात का तो एहसास हुआ,
जब मेरी नींद ही मेरे बस में नहीं है तो साँसे कैसी होगी?

जनम से लेकर मौत की गोद में सोने तक आँखें ही तो सब नज़ारें दिखाती है,

मन की और दिमाग की आँखें दुनिया में छिपी सारी विविधताओं को,
सही ढंग से सराहती है,यह एहसास दिलाती है की किस किस्म के लोग होते है,
वे बुरा व्यवहार क्यों करते है?अगर अच्छा करते है तो क्यों?

हर एक चीज़ के पीछे एक वजह होती है,

बस यही वजह जानने के लिए एक अनूठी आँखों की जरूरत होती है,
क्यूंकि वह सादी आँखों से नहीं दीखता,
और ऐसे नज़रिये की प्राप्ति इतनी भी सरल नहीं है,
भक्ति की शक्ति को ऐसेही नहीं सराहते लोग,
मंदिरों में जाकर ऐसेही नहीं चढाते भोग|

में तो कहती हु की मंदिरों में जाने की जरूरत ही क्या है?

जो मन में मैल भरा पड़ा है,वह साफ़ करना है,
भगवन के सामने मत्था टेकने से अगर सब कुछ टल जाता,
तो सारे यही करते,बिना सोचे समझे बस मत्था ही टेकते रहते|

हे भगवान..!आखिर में यह कविता ख़त्म तो करने की सूचना दे मुझे|

कलम को कागज पर अभी चलने से रोक ले मुझे..!
और न लिख सकुंगी में,
इंन्सानी दुनिया की बुराई न कर सकुंगी में,
आखिर एक इंन्सान जो हु में,
बस ढूँढती रहती हु इंन्सानों  में एक अच्छा इंसान,
जो सारे भगवानो को प्यारा हो,
और जो मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर मुझे उससे प्यार करना सिखाता हो|

-------यशश्री 


बटुएसा दिल...


मेरे बटुए में मानो मेरी सारी ज़िन्दगी छिपी है,
कुछ कही, कुछ अनकही बातों की लिपि है,
मेरे बटुए में चार हिस्से है,
पहले हिस्से में भगवान की तस्वीर है,
दूजे हिस्से में रेल्वे का पास,
तीजे में नकद है,
आखरी और चौथे हिस्से में कई सिक्के है,
जिनकी खनखनाहट हमेशा मुझे टोकती रहती है,
वो सिक्के मेरे जेब में कई दिनों से ज्यो की त्यों पड़े है,
पता नहीं क्यों इन्हें खर्च करने का मन नहीं करता,
ऐसा लगता है इन्हें बस गिनती चलू और वापिस बटुए में रख दू,
मेरा बटुआ बिना कहे सब कुछ कहता है,
खुदमें यह मेरी सारी पर्चियां समां लेता है,
काश..........ऐसा मेरा दिल भी होता,
जो हर एक को खुद में समां लेता,
सामने वाला कैसा भी हो,
बस बिना पहचाने ही अपना लेता। 

-----यशश्री. 

एक कदम



तुम्हारे शब्दों की बंदगी हो
जिसमे मेरी आज़ाद आवाज़ हो…
तब चलेंगे हम.

तुम्हारी ज़िन्दगी के दरम्यान
मेरी कल्पना की जुस्तुजू हो…
तब चलेंगे हम. 

तुम्हारी हाँ की सोज़ में
मेरी हर ना का जवाब मिले…
तब चलेंगे हम.

तुम्हारी ज़िद की ताक़त में
मेरी सफलता की हार दिखे…
तब चलेंगे हम. 

तुम्हारी मुस्कान की रौनक में
मेरी रात का शामिल निश्चय हो…
तब चलेंगे हम. 

तुम्हारी पुकार की आज़ादी में
मेरी saaz तृप्त हो…
तब चलेंगे हम. 

तुम्हारी सुबह की आशा में
मेरी शाम मद्धम हो…
तब चलेंगे हम.

तुम्हारी ज़िन्दगी की एक आस हो
मेरी रूह की वही आहात हो
तब चलेंगे हिम.
beach foot steps


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